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हाँ, पर इंटरनेट जितना मानता है उतना नहीं, और दूध पड़ने के बाद तो और भी कम। बिना दूध की काली चाय का कप लगभग पूरा पानी ही है, इसलिए पानी की कठोरता और ताज़गी उसमें नापने लायक़ फ़र्क़ लाती हैं। दूध वाली चाय में दूध और चीनी ज़्यादातर फ़र्क़ ढँक लेते हैं। रखने लायक़ आदत एक ही है: पतीले में पड़ा पुराना पानी दोबारा उबालने के बजाय हर बार ताज़ा भरिए।

यह उन विषयों में से है जहाँ इंटरनेट की सलाह आत्मविश्वास से भरी है, तकनीकी है, और लगभग पूरी की पूरी उस आदमी के लिए लिखी गई है जो बिना दूध पहले फ़्लश की नाज़ुक चाय भिगो रहा है। स्टील के पतीले की कड़क चाय के लिए उसमें से लगभग कुछ भी नहीं लिखा गया। कप में असल में क्या बदलता है, वह इस क्रम में है।

क्या पानी का चाय पर असर पड़ता है?

काली चाय पर बहुत पड़ता है, दूध वाली चाय पर कहीं कम, और वजह सीधा हिसाब है। बिना दूध की काली चाय का कप क़रीब 99% पानी है, इसलिए उस पानी में जो कुछ घुला है वही आपके चखने का बड़ा हिस्सा है। दूध वाली चाय का कप मोटे तौर पर आधा पानी और आधा दूध है, ऊपर से चीनी, और आमतौर पर अदरक या इलायची। इनमें से हर एक पानी पर भारी पड़ता है।

तो ईमानदार जवाब यह है: अगर आप चाय बिना दूध पीते हैं, तो पत्ती के बाद पानी दूसरी सबसे बड़ी चीज़ है। अगर आप दूध वाली चाय पीते हैं, तो वह सूची में काफ़ी नीचे है, पत्ती, उबाल, दूध और समय के बाद। समझ लेना अच्छा है, पर निराश करने वाला कप आमतौर पर यहाँ नहीं बिगड़ता।

क्या चाय के लिए पानी दोबारा उबालना चाहिए?

ताज़े पानी में हवा घुली होती है। उबालने पर वह निकल जाती है, और जो पानी केतली या पतीले में दो-तीन उबाल झेल चुका है उसमें से वह लगभग जा चुकी होती है। उस पानी की चाय ज़्यादा सपाट लगती है, थोड़ी मंद, घूँट की शुरुआत में कुछ कम जानदार।

असर सचमुच होता है और छोटा होता है। बिना दूध की सादी चाय में आप उसे पकड़ लेंगे। दूध वाली चाय में ढूँढ़ते रह जाएँगे। पर सुधार में कुछ ख़र्च नहीं होता, इसलिए न करने की कोई वजह भी नहीं: बचा हुआ पानी गिरा दीजिए, ताज़ा भरिए, एक बार उबालिए।

क्या दोबारा उबाला हुआ पानी ख़तरनाक होता है?

आपको ऐसे दावे मिलेंगे कि दोबारा उबालने से पानी में आर्सेनिक, नाइट्रेट या फ़्लोराइड ख़तरनाक हद तक गाढ़े हो जाते हैं। नगरपालिका की सप्लाई के मामले में यह डर फैलाना है, जिसमें रसायन का एक कण भर सच है। गाढ़ापन तभी बढ़ता है जब पानी भाप बनकर उड़े, और चाय के लिए एक-दो मिनट पतीला उबालने में मात्रा का बहुत मामूली हिस्सा उड़ता है। इनमें से किसी भी आँकड़े को हिलाने के लिए आपको पतीले का ज़्यादातर पानी बार-बार सुखा देना पड़ेगा, और रसायन से बहुत पहले आपको ख़ुद दिख जाएगा।

दोबारा उबाला हुआ पानी सपाट कप देता है। उसके ख़िलाफ़ पूरा मामला बस इतना ही है।

कठोर पानी चाय के साथ क्या करता है?

कठोरता का मतलब है पानी में घुला कैल्शियम और मैग्नीशियम, और यहाँ मात्रा से ज़्यादा उसकी क़िस्म मायने रखती है।

अस्थायी कठोरता वाले पानी में कैल्शियम बाइकार्बोनेट होता है। केतली में पपड़ी यही जमाता है: गरम कीजिए और बाइकार्बोनेट घोल से बाहर आकर तली पर सफ़ेद परत बन जाता है। यह पानी को क्षारीय भी कर देता है, और क्षारीय पानी चाय को गहरा करते हुए सपाट कर देता है। रंगत गहरी और मंद हो जाती है, कसाव नरम पड़ जाता है, और अच्छी असम कसाव वाली लगने के बजाय बस गहरी लगने लगती है।

स्थायी कठोरता वाले पानी में कैल्शियम सल्फ़ेट होता है, जो उबालने पर नीचे नहीं बैठता। वह पपड़ी नहीं छोड़ता और चाय के साथ बाइकार्बोनेट वाली क़िस्म से कहीं ज़्यादा नरमी बरतता है।

नरम पानी सबसे साफ़, सबसे चमकदार और सबसे कसाव वाला कप देता है, और इसीलिए वही पैकेट किसी दूसरे शहर में रिश्तेदार के घर साफ़ तौर पर बेहतर लग सकता है, और इसीलिए काली चाय के कप पर दिखने वाली इंद्रधनुषी परत एक शहर में दिखती है और दूसरे में नहीं।

पर एक निचली हद भी है। जिस पानी में लगभग कुछ बचा ही न हो, यानी बिना खनिज वापस मिलाए आरओ का पानी, या आसुत जल, उससे भी सबसे अच्छी चाय नहीं बनती। थोड़े खनिज निचुड़ने को सँभालकर चलने में मदद करते हैं; उन्हें पूरी तरह निकाल दीजिए तो कप एक साथ खोखला भी लगता है और अजीब तरह से रूखा भी।

किस तरह का पानी काली चाय के साथ क्या करता है
पानी पहचान कप पर असर
नरम साबुन आसानी से झाग देता है, केतली में पपड़ी नहीं सबसे साफ़, सबसे चमकदार रंग और पूरा कसाव
अस्थायी कठोरता केतली की तली पर सफ़ेद पपड़ी गहरा पर मंद, कसाव दब जाता है
स्थायी कठोरता झाग कम बनता है, पर पपड़ी कम या बिलकुल नहीं हल्का असर, पपड़ी वाले पानी से ज़्यादा नरम पानी के क़रीब
आरओ, जिसमें कुछ वापस नहीं मिलाया गया पानी ख़ुद पीने में सपाट लगता है खोखला भी, और अजीब तरह से रूखा भी

मुंबई और ठाणे पट्टी का पानी कठोर है या नरम?

शहर का ज़्यादातर हिस्सा झील का पानी पीता है। मुंबई की, और उसके साथ नवी मुंबई तथा ठाणे पट्टी के बड़े हिस्से की नगरपालिका सप्लाई ज़मीन के नीचे से नहीं, शहर के पूरब और उत्तर के जलाशयों से आती है, और झील से आया ऊपरी सतह का पानी आमतौर पर नरम की तरफ़ होता है। चाय के लिए यह अच्छी ख़बर है, और इसीलिए मुंबई में नगरपालिका के पानी से बनी सादी चाय को आमतौर पर किसी मदद की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

ज़मीन का पानी अलग मामला है। डोंबिवली, अंबरनाथ, बदलापुर और कर्जत तक फैली जो इमारतें और क़स्बे बोरवेल से पानी लेते हैं, और जो कोई टैंकर के पानी पर चलता है, उनके कठोर पानी में चाय बनाने की संभावना कहीं ज़्यादा है। शहर के भीतर भी बहुत सी सोसाइटियाँ बिना बताए बोरवेल से टंकी भरती रहती हैं।

यह जानने के लिए किसी जाँच किट की ज़रूरत नहीं। जिस केतली या पतीले में आप पानी उबालते हैं, उसकी तली देख लीजिए। सफ़ेद पपड़ी का मतलब है अस्थायी कठोरता, और उसका मतलब है कि हर बार आपकी चाय थोड़ी सपाट हो रही है। जो साबुन झाग नहीं देता, वह भी यही बता रहा है।

कठोर पानी का क्या किया जा सकता है?

मेहनत के मुक़ाबले जितना फ़र्क़ पड़ता है, उसी क्रम में।

हर बार ताज़ा पानी भरिए। मुफ़्त, इसमें समय भी नहीं लगता, और इनमें से यही अकेली बात है जो सब पर लागू होती है।

केतली या पतीले की पपड़ी छुड़ाइए। अगर परत जमी है, तो वह आपके बनाए हर कप में वापस घुल रही है। साइट्रिक एसिड या सादा नींबू, उबालकर और धोकर, उसे साफ़ कर देता है।

पानी कठोर है तो पानी नहीं, चाय बनाने का तरीक़ा बदलिए। कठोर पानी कसाव दबा देता है, इसलिए दूध पड़ने के बाद थोड़ा कम उबालने से जितनी चमक बची है वह बच जाती है। पत्ती बढ़ाकर उसके पीछे भागने से कप भारी होता है, चमकदार नहीं।

छना हुआ पानी, अगर पहले से घर में है तो। कठोरता घटाने वाला घरेलू फ़िल्टर आपको काली चाय का साफ़ तौर पर ज़्यादा चमकदार कप देगा। सिर्फ़ चाय के लिए वह ख़रीदना बनता नहीं, और दूध वाली चाय में तो आप उस चीज़ को सुधारने का पैसा दे रहे होंगे जिसे दूध अभी ढँकने ही वाला है।

एक नज़र में

  • काली चाय 99% पानी है और दूध वाली चाय क़रीब आधी। पानी उसी अनुपात में मायने रखता है।
  • ताज़ा भरिए, एक बार उबालिए। दोबारा उबला पानी सपाट लगता है, और उसके ख़िलाफ़ असली एतराज़ बस यही है।
  • “दोबारा उबालना ज़हर है” वाला दावा हिसाब लगाते ही टिकता नहीं।
  • केतली पर पपड़ी का मतलब है अस्थायी कठोरता, जो कप को गहरा और मंद कर देती है।
  • मुंबई और ठाणे पट्टी की झीलों से आने वाली नगरपालिका सप्लाई आमतौर पर नरम है। बोरवेल और टैंकर का पानी आमतौर पर नहीं।
  • ताज़ा पानी भरने के बाद सबसे ज़्यादा काम की चीज़ पतीले की पपड़ी छुड़ाना है।
  • कड़क चाय के कप में पत्ती, उबाल और दूध, तीनों पानी से ऊपर हैं।

लिखा है गणेश प्रीमियम टी, मुंबई के परिवार ने, जो 1986 से एक ही कड़क असम सीटीसी बनाता आया है। हमारे बारे में और।

पढ़ने से बात यहीं तक बनती है।

जिस चाय की यह सारी बात है, 100 ग्राम से 1 किलो तक, पूरे भारत में पहुँचाई जाती है।

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